मुद्दतों बाद ज़िंदगी की किताब के कुछ पन्ने तिल मिला से रहे हैं...
कहते हैं आप अपने दर्द को कितना भी जला दें उसका धुआँ साथ ही चलता रहता है,
कभी भी घुटन पैदा कर सकता है...
ज्यादा वक़्त नहीं गुज़रा है जब गाढ़ी रूमानियत में डूबे कुछ लफ्ज रोपता रहता था सूखी पड़ी अलमारियों पे...
यूं डूब कर लिखना तब शुरू किया था जब मेरी किताब के कुछ पन्ने हमेशा-हमेशा के फाड़ दिये थे तुमने....
न जाने तुम्हारे लिए कैसे इतना आसान हो गया, यूं मुँह फेर लेना...
न कुछ समझ आया और न ही तुमसे कोई जवाब ही मांगा आज तक,
कई सालों तक मेरे कमरे की अधखुली अलमारी में से वो तोहफा झाँकता रहा जो खरीद रखा था किसी खासदिन के लिए...
एक दिन यूं ही जब नाहन* की नारंगी शामों के साये में मेरे मकान के पास वाले नुक्कड़ पर कभी एक पहाड़ी गीत सुन लिया था,
समझ तो कुछ नहीं आया लेकिन इतना दर्द जैसे कोई बादल फट पड़ा हो किसी अंजान खाई के ऊपर...
बर्फ की चादर पर कई सारी यादें तना दर तना उखड़ती चली गईं...
वक़्त अब बीत चुका है,
मैं बहुत आगे निकल आया और शायद तुम भी...
हाँ कुछ लम्हों से आज भी कुछ यादें झरती रहती हैं,
लेकिन सच बताऊँ तो विश्वास नहीं होता कि कभी तुम्हारे जैसा भी कोई था मेरी ज़िंदगी में...
अच्छा ही हुआ तुमने उतार लिया अपने अस्तित्व का बोझ मुझपर से...
आज जब कनखियों से अपनी ज़िंदगी को देखता हूँ तो तुम कहीं नज़र नहीं आती,
बस एक चेहरा दिखता है जिसने अचानक से आकर ज़िंदगी को करीने से सज़ा दिया है... तुम्हें पता है हम अक्सर छोटी-छोटी बातों पर झगड़ते रहते हैं,
बिना मतलब ही यूं ही...
लेकिन इसी झगड़े के बीच हमारा प्यार बूंद-बूंद पनपता रहता है,
हथेलियों से समेटने की कोई कोशिश नहीं...
मुस्कुराहटें आती रहती हैं और इसबार उन मुस्कुराहटों का रंग अलग सा दिखता है...
मैं खुश हूँ सच में बहुत खुश...
जब भी गौर से उसकी आखों में देखूँ न तो बस लगता है मानो कह रही हों....
मुझे तुमसे प्यार है....शायद यही ज़िंदगी है...
शुक्रिया ज़िंदगी....
शुक्रिया मुझे यूं जगाए रखने के लिए, मेरी दुआओं को हर उस जगह पहुंचाते रहना जहां से मेरे लिए दुआएं निकलती रहती हैं....
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